Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
आकाश कर्षकष एव निकर्षणं ते मन्ये चिरं समचितं न तु किंचिदन्यत् ।
शून्योऽसि यज्जलधरर्क्षविमानचन्द्रसूर्यानिलान्वहसि भासि न चार्थशून्यः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
कोर्ड तीन उत्तम मोतियों की खानों और उनमें से उत्तम मोतियों की उत्पत्ति का वर्णन करता हैं /
पर्वतों में विशेष बाँसो की गाँठ के छेद में और सागर में जलाकांक्षिणी सीपों के भीतर स्वाति
नक्षत्र में जो वर्षाबिन्दु प्रविष्ट होते हैं, वे मोती का रूप धारण करते हैं एवं मोतियों की ये तीन
प्रसिद्ध जातियाँ स्थानशुद्धि होने पर स्थूलतारूपी उत्कृष्ट गुण से भी उत्तम गुणवाली होती हैं