Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 116, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 116 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
धूमाभ्ररेणुतिमिरार्कनिशेशसंध्या ताराविमानगरुडाद्रिसुरासुराणाम् ।
क्षोभैरपि प्रकृतिमुज्झति नान्तरिक्षं चित्रोत्थिता स्थितिरहो नु महाशयस्य ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
युण्यतम प्रदेश, वन, तीर्थ आदि के दर्शन से दुभाग्यिनिव्र्तिरूप महन् फ़ल है, एसा कहते है/
देश-देशान्तरो में फैले हुए अन्यान्य वनों, पुष्पवाटिकाओं, उपवनों तथा नगरों को ओर तीर्थो
में पवित्र स्थानों और जलों को देखकर दुभाग्यभीति बड़े वेग से दूर भाग जाती है