Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 39
अड़तीसवाँ सर्ग समाप्त उनतालीसवाँ सर्ग पाताल में जाकर शंखध्वनि से प्रबोधित प्रह्लाद से भगवान् का कल्पपर्यन्त राज्य करने के लिए कहना ।
50 verse-groups
- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स श्रीरामचन्द्रजी, ऐसा विचारकर सर्वात्मा भगवान् क्षीरसागररूप…
- Verses 2–3भगवान् उसी क्षीरसागर के तले के छेद से जिसका जल रोक दिया गया था, द्वितीय इन्द्रनगर के तुल…
- Verse 4वहाँ पर विष्णु भगवान् के तेज से वे सबके सब देत्य धूलि के समान उड़ गये ओर सूर्य की प्रखर…
- Verse 5दो या तीन मुख्य-मुख्य असुरो के साथ परिवारयुक्त भगवान् श्रीहरि ने जैसे तारों से परिवेष्टि…
- Verse 6भगवान् गरुडरूपी आसन पर बैठे थे, श्रीलक्ष्मीजी उन पर चँवर डला रही थी, शंख, चक्र, गदा, आदि…
- Verse 7इस प्रकार के विष्णु भगवान् ने “हे महात्मन्, जागो", यह कहते हुए ओर दिकृमण्डल को मुखरित क…
- Verses 8–9भगवान् विष्णु के बल से उत्पन्न हुए उस महान् शब्द से, जिसका वेग एक साथ क्षुब्ध हुए प्रलय…
- Verse 10किन्तु जैसे मेघ के शब्द से कुटज वृक्षों की पंक्ति खिल उठती हे वैसे ही भयरहित वैष्णवी जनता…
- Verse 11वर्षा ऋतु में वन में फूले हुए कदम्ब की तरह दानवराज प्रह्लाद धीरे-धीरे प्रबुद्ध हुआ
- Verse 12तदनन्तर जैसे गंगाजी धीरे-धीरे सारे सागर को भर देती है वैसे ही ब्रह्मरन्ध्र में उदित हुई प…
- Verse 13क्षणभर में जैसे उदय के अनन्तर सूर्य की प्रभा भुवन के मध्य को पूर्ण कर देती है वैसे ही प्र…
- Verse 14तदनन्तर इन्द्रियों के नौ छिद्रों में प्रवृत्त होने पर उसकी चेतनाशक्ति लिंगदेह रूपी दर्पण…
- Verse 15हे श्रीरामचन्द्रजी, चेतनीय विषयोन्मुखी चित् चेत्याकार संस्कार का उद्बोध होने से चेत्य-सी…
- Verse 16चित्त के कुछ अंकुरित होने पर जैसे प्रातःकाल मेँ नीलकमल विकसित होने लगते हैं वैसे ही उसके…
- Verse 17जैसे वायु से प्रेरित कमल में स्पन्द होता है वैसे ही भीतर प्रविष्ट प्राण ओर अपान से उद्बोध…
- Verse 18जैसे पूर्ण जल में तरंग होती है वैसे ही केवल एक निमेष में प्राणों से पूर्ण उसमें मन स्थूलत…
- Verse 19जैसे सूर्य के आधे उदित होने पर तालाब में कमलों मे स्फुरण हो जाता है वैसे ही उसके भी नेत्र…
- Verse 20इस बीच में जैसे ही भगवान् श्रीहरि ने "जागो, यह कहा वैसे ही मेघ के गर्जन से मयूर के समान…
- Verse 21त्रिलोकाधिपति भगवान् कल्प के आदि में जैसे नाभिकमल स उत्पन्न ब्रह्मा से कहते हैं वैसे ही…
- Verse 22“हे साधो, तुम महती दैत्यराज्यश्री का और अपनी आकृति का स्मरण करो। तुम देह के विस्मरण से अन…
- Verse 23यदि - ~न वै सशरीरस्यप्रियाप्रिययोरपह॒तिरस्ति” (सशरीर पुरुष के इष्ट ओर अनिष्ट का विनाश नही…
- Verse 24हे वत्स, तुम्हे कल्पपर्यन्त इस देह से यहाँ पर रहना होगा । हम तुम्हारे यथार्थ ओर अगर्हित आ…
- Verse 25यहाँ पर राज्य सिंहासन पर ही स्थित हो रहे जीवन्मुक्तरूप तुमको कल्पतक इस शरीर को बिना किरी…
- Verse 26हे निष्पाप, जैसे घडे के फूटने पर घटाकाश महाकाश में समा जाता है वैसे ही इस शरीर के कल्पान्…
- Verse 27तुम्हारा यह शरीर, जो कल्पान्त तक रहनेवाला है, लोक के विविध व्यवहारो को देख चुका है ओर जीव…
- Verse 28तो क्या कल्पान्त निकट है 2 ऐसी आशंका होने पर नहीं, ऐसा कहते है। हे सज्जनशिरोमणे, अभी प्रल…
- Verse 29अभी तीनों लोकों की राख से धूसर तथा देवताओं की चंचल खोपड़ियाँ जिसकी चिहभूत हैं, ऐसी प्रलयक…
- Verse 30अशोक के वृक्षों पर मंजरियों की नाई इस समय ब्रह्माण्ड में पुष्करावर्तनामक प्रलयकालीन मेघों…
- Verses 31–33जल रही भूमि के प्रकम्प से विदीर्ण होने के कारण जिसमें पर्वत शब्द कर रहे हों और अग्नि के ज…
- Verse 34यह वक्त, जिसमें प्रलयकाल के मेघ वृद्धि को प्राप्त हुए हों ऐसा नहीं हुआ है और जिसमें ब्रह्…
- Verse 35मे गरुड पर सवार होकर अण्डज आदि चार प्रकार के प्राणियों से व्याप्त तथा सूर्य आदि के प्रकाश…
- Verse 36ये हम लोग हैं, ये पर्वत हैं, ये प्राणी है, यह तुम हो, यह जगत् है, यह आकाश है, इसलिए तुम…
- Verses 37–38तो किसका मरना उचित है, ऐसा प्रश्न होने पर कहते है। जिसके व्याकुल मन को घन अज्ञान के सम्बन…
- Verse 39मैं कृश हूँ, मैं अत्यन्त दुःखी हूँ और मैं मूढ हूँ ये या इनसे अन्य भावनाएँ जिसकी मति को नष…
- Verse 40जैसे मूढ़ पुरुष महान् फल देनेवाले धान के अंकुर आदि को उसे खानेवाले पशु आदि के लिए काट दे…
- Verse 41जिसके ताड वृक्ष के समान राग आदि की उन्नति से (अभिवृद्धि से) सम्पन्न मनरूपी वन में चित्तवृ…
- Verse 42जिसके इस देहरूपी दुष्ट वृक्ष को, जिसमें रोमराजीरूपी शाखाओं का समूह है, काम आधि अनर्थरूपी…
- Verse 43आधिव्याधिरूपी वनाग्नियाँ जिसके चंचल अंगरूपी लतावाले स्वदेहरूपी वन को जलाती हैं, उसका मरना…
- Verse 44जैसे सूखे हुए वृक्ष के खोखले में अजगर फुफकारता है वैसे ही काम क्रोधरूपी अजगर जिसके शरीर म…
- Verse 45मरणस्वरूप का पर्यालोचन करने पर भी तत्त्वज्ञानी का मरण संभव नहीं है, ऐसा कहते हैं। जो यह द…
- Verse 46किसका जीवन शोभित होता है, ऐसा प्रश्न होने पर जिसका जीवन सफल है, उसे कहते हैं। जिसकी बुद्ध…
- Verse 47एक देह में अभिमान होने पर उसका त्याग मरण है, जिसका किसी देह में अहंभाव नहीं है और जिसकी ब…
- Verse 48जो रागद्वेष से रहित अन्तःशीतल बुद्धि से साक्षी के समान इस जगत् को देखता है, उसका जीवन शो…
- Verse 49असार जानकर हेय ओर उपादेय का त्याग कर रहे जिसने चित्त के विरामभूत साक्षी में अपने चित्त का…
- Verse 50जिसने शुक्ति, रजत आदि के सदृश वस्तु के समान भासमान बाह्मार्थकल्पना रूप मल में अनासक्त चित…
- Verse 51जो सत्य दृष्टि का अवलम्बन करके इस जगत्-व्यवहार को बिना वासना के लीला से करता है, उसका जी…
- Verse 52जो लोकव्यवहार करता हुआ भी दुःखहेतु पदार्थ की प्राप्ति होने पर न तो उद्वेग को प्राप्त होता…
- Verse 53तालाब से हंसों के समूह के समान जिससे गुणों का (शान्ति, क्षमा, माधुर्य आदि का) समूह चला जा…
- Verse 54जिसके गुण आदि के श्रवणगोचर होने पर, दर्शन होने पर और स्मरण होने पर प्राणियों को बड़ा आनन्…
- Verse 55हे दनुजेश्वर, जिसकी सम्पत्ति (उदय) होने पर जीवरूपी भ्रमर से युक्त जीवरूपी कुमुद हृदय से आ…