Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
यस्योदयेषु हृदयेन जनाम्बुजानि जीवालिमन्ति सकलानि विलासवन्ति ।
तस्यैव भाति परिजीवितमक्षयेन्दोरापूर्णतेव दनुजेश्वर नेतरस्य ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे दनुजेश्वर, जिसकी सम्पत्ति (उदय) होने पर जीवरूपी
भ्रमर से युक्त जीवरूपी कुमुद हृदय से आनन्दित होते हैं, क्षयरोगरहित चन्द्रमा की पूर्णता के समान
उसी का जीवन शोभित होता है अन्य का (अज्ञानी का) नहीं