Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
यस्य नोत्क्रामति मतिः स्वात्मतत्त्वावलोकनात् ।
यथार्थदर्शिनो ज्ञस्य जीवितं तस्य शोभते ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
किसका जीवन शोभित होता है, ऐसा प्रश्न होने पर जिसका जीवन सफल है, उसे कहते हैं।
जिसकी बुद्धि स्वात्मतत्त्व के विचार से उचटती नहीं, उस यथार्थदर्शी तत्त्वज्ञानी का जीवन शोभित
होता है। भाव यह है कि देह से प्राणों का उत्क्रमण मरण नहीं है किन्तु आत्मतत्त्व से मति का उत्क्रमण
ही मरण है। उक्त मरण ज्ञानी का कदापि नहीं हो सकता, इसलिए सदा ही उसका जीवन शोभा देता
है। अज्ञानी की तो मति आत्मतत्त्व से सदा उत्क्रान्त रहती हे, अतएव वह नित्यमृतस्वरूप है