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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 39, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

स्फुटदद्रीन्द्रटंकाराः कराः सौरा भ्रमन्ति खे । कल्पाभ्राणि न गर्जन्ति तनुं त्यजसि किं मुधा ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

यह वक्त, जिसमें प्रलयकाल के मेघ वृद्धि को प्राप्त हुए हों ऐसा नहीं हुआ है और जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नामक तीन देवता शेष रह गये हों, ऐसा नहीं हुआ है; इसलिए तुम व्यर्थ शरीर का त्याग क्यों करते हो ? ॥३ २॥ यहाँ पर दिशाएँ जर्जरित नहीं हुई हैं जिनके भेद का अनुमान लोकालोक पर्वत के शिखरों से होता है, जो भूमिरूपी कमल की पँखुड़ियों के सदृश हैं, तुम व्यर्थ शरीर का त्याग क्यों करते हो ? ॥३ ३॥ आकाश में बारहो आदित्यो की तोड़े जा रहे मेरु के टकार की तरह ध्वनिवाली किरणें नहीं घूमती हैं और प्रलयकाल के मेघ नहीं गरजते हैं फिर तुम व्यर्थ शरीर का त्याग क्यो करते हो ?