Guru's AddaGuru's Adda

Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 35

47 verse-groups

  1. Verses 1–2पूर्वोक्त प्रकार से भीम, भास और दृढ़ की तरह व्यवहार कर रहे आपको सम्पूर्ण व्यवहारो मेँ निर…
  2. Verse 3मनोनिग्रह के उपायों में भोगेच्छा का त्याग ही मुख्य उपाय है, ऐसा कहते हैं। ज्ञानसर्वस्व का…
  3. Verse 4विषयो में दोषदर्थन से घृणा भोगेच्छा की भी चिकित्सा है, ऐसा कहते है। अन्य शास्त्र निबन्धों…
  4. Verse 5विचार के बिना सहसा विषयों का त्याग दुःखदायी होता है । विचार कर गुरु ओर शास्त्र की आज्ञा क…
  5. Verse 6भोगवासनाओं के रहने पर क्या हानि होती है ? ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो उस पर कहते है। जिस भ…
  6. Verse 7इसलिए जिस मति में वासनाओं के समूह का सम्बन्ध नहीं हे, अतएव जिसमें राग ओर द्वेष दृष्टि नही…
  7. Verse 8शुभ मति जिनसे दुःख नहीं होता एसे शम, दम आदि सद्गुणो से युक्त ज्ञान, समाधि और विश्रान्तिरू…
  8. Verses 9–15अब क्रम से दया, दाक्षिण्य, क्षमा आदि शुभ भावों के अभ्यास से लेकर समाधिपर्यन्त मन की विश्र…
  9. Verse 16इस प्रकार का मन क्या करता है ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं। आत्मा कौन है, किस तरह का है, क…
  10. Verse 17मन इस प्रकार अपने स्वरूप का विनाश करता है ऐसा यदि कोई कहता हो तो इस पर कहते है। पहले मन व…
  11. Verse 18यदि कोई शंका करे, अपना नाश तो अभ्युदय है नहीं, प्रत्युत वह अनर्थ ही है, उसमें मन की प्रवृ…
  12. Verse 19फिर-फिर उगे, इसमें क्या हानि है ? ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते है। मनोमात्र ही जगतों का…
  13. Verse 20इस मन का क्या स्वरूप है जिसका कि अवश्य उच्छेद करना चाहिये । इस प्रश्न पर कहते हैँ । चित्त…
  14. Verse 21इस प्रकार का मन हो, पर उसके द्वारा बन्धन में डाले जानेवाले जीव का स्वरूप क्या है ? ऐसा यद…
  15. Verse 22विषयों में वासनारूप से गिरा हुआ तथा चिरकाल के अभ्यास से विषयों में ही दृढ़ आत्मत्वाभिमान…
  16. Verses 23–24इस प्रकार जीव और जीव की उपाधि दिखलाकर उनसे रहित शुद्ध आत्मस्वरूप को दशति है । आत्मा न तो…
  17. Verse 25शरीर में जड़ता आदि को ही स्पष्टरूप से विशद करते हैं। शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने पर रुधिर…
  18. Verse 26जैसे रेशम का कीड़ा अपने बन्धन के लिए जाल की रचना करता है वैसे ही जीव मन में विकल्प वासनाओ…
  19. Verse 27जीव की देहात्मकता के अभाव में युक्ति कहते हैं। जीव इस वर्तमान देह भ्रम का त्याग करके पुन:…
  20. Verse 28शरीर वासनामय है, इसमें युक्ति कहते हैं। यह मन जैसी भावनावाला होगा, वैसा ही शरीर उत्पन्न ह…
  21. Verse 29विषयों के वासना स्थापन में दृष्टान्त कहते हैं। इमली का बीज शहद के रस से यदि सींचा जाय, तो…
  22. Verses 30–31महती शुभवासना से चित्त महान होता हे । मनुष्य 'मैं इन्द्र हूँ इस प्रकार का मनोरथ होने पर इ…
  23. Verse 32क्षुद्र वासना से चित्त तुच्छ क्षुद्रता को देखता है। पिशाच की भ्रान्ति से मनुष्य रात्रि मे…
  24. Verses 33–35मन यदि अत्यन्त कलुषित हो, तो फल भी वैसा ही उत्पन्न होता है, उसी प्रकार मन यदि अत्यन्त निर…
  25. Verses 36–38यदि कोई कहे कि दुर्भिक्ष आदि देशोपद्रव से समाधि का भंग हो जाने पर फिर मलिनता की प्राप्ति…
  26. Verse 39सर्वव्यापक, स्वच्छ, आत्मा में “मैं यह देह मात्र हूँ” इस प्रकार की जो भावना है, यह लोक में…
  27. Verse 40बन्धन-मोक्ष अवस्थाओं से रहित, द्वित्व-एकत्व से शून्य यह सब ब्रह्मसत्ता ही है, इस प्रकार क…
  28. Verses 41–42निर्मलता की अधिकता से जिसे स्वविनाशप्रायः प्राप्त हो गया है, अतएव अमनस्ता को प्राप्त, सम्…
  29. Verse 43समाधि के अभ्यास से उत्पन्न धर्मवृद्धि रूप जल से निर्मलता को प्राप्त हुआ मन इस प्रकार सर्व…
  30. Verse 44शुद्ध मन का उत्तम स्फटिक मणि के तुल्य अधिकारी-अनधिकारी शरीररूप का अभिमान होने से पहले शरी…
  31. Verse 45द्वैतदर्शन के समय ही बन्धनप्राप्ति को ओर आत्मदर्शन के क्षण में तुरन्त मोक्षप्राप्ति को हा…
  32. Verse 46बाह्य ओर आभ्यन्तर पदार्थो के साथ सब दृश्य दृष्टि का त्यागकर जब मन स्थित होता है तब परम पद…
  33. Verse 47जो यह स्फुट दृश्य दृष्टि है वह अवश्य असन्मयी है, मन के स्वरूप को भी आप उक्त असत्‌ दृश्यमय…
  34. Verse 48दृश्य और दृष्टि असन्मय कैसे हैं ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं। आदि और अन्त में असद्‌ होने क…
  35. Verse 49यह जगत आत्मा ही है, इस प्रकार के बोध के बिना यह दृश्य शोभा दुःखदायिनी है । उक्त बोध होने…
  36. Verse 50लोकव्यवहार के समान ही शास्त्र में भी ज्ञानिता और अज्ञानिता का बोध करना चाहिये। वे कोड अपू…
  37. Verse 51नानात्व का क्यो परित्याग करना चाहिये और एकत्व का क्यो ग्रहण करना चाहिये ? इस प्रश्न पर कह…
  38. Verse 52यदि कोई कहे, अत्यन्त प्रिय, मन बुद्धि आदि द्वैत के सत्य होने से और आत्मा के उपकरण होने से…
  39. Verse 53राग और द्वेष के रहने पर इष्ट वस्तु के वियोग से ओर अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति से शोक होता है…
  40. Verse 54जैसे स्नेह रहित बन्धु के मिलने से पुरुष को न तो सुख होता है और न उसके वियोग से दुःख होता…
  41. Verse 55जिस अधिष्ठान में मन का क्षय हो जाता है, उसका स्वरूप कहते हैं। वह वस्तु अनादि नित्य निरतिश…
  42. Verse 56मन के नष्ट होने पर स्थूल देह भी असत्‌ हो जाती है, ऐसा कहते हैं। मनरूपी वायु के नष्ट होने…
  43. Verses 57–64अविद्या के क्षय के प्रकार का ही शरत्काल के रूपक से वर्णन करते हैं। वासनारूपी वर्षा ऋतु का…
  44. Verse 65पर्वत ओर वनों की विशालता से युक्त भुवनान्तर के तुल्य शरीर आत्मप्रकाशरूपी सूर्य -चन्द्रमा…
  45. Verses 66–67परिच्छेद के हट जाने से विस्तारित, विवेकररूपी जल की वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त किया गया,…
  46. Verse 68देहरूपी नगर का अधिपति यानी जीव संकोचरहित, सर्वव्यापक और सबका अधिपति हो जाता है
  47. Verse 69वासनाक्षय के फलों को विस्तार से कहकर उन्हीं से जीवन्मुक्ति की स्थिति दिखलाते हैं। चित्त क…