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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

शुद्धस्य मनसः कायशास्त्रवैराग्यबुद्धिभिः । अभिजातोपलस्येव जगत्तस्येति विद्युतिः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

शुद्ध मन का उत्तम स्फटिक मणि के तुल्य अधिकारी-अनधिकारी शरीररूप का अभिमान होने से पहले शरीररूप से, तदनन्तर सतृशारत्रों के श्रवण का अभिमान होने से शास्त्ररूप से तथा वैराग्यरूप से, तदनन्तर आत्मबोध होने से बोधरूप से जो विविध प्रकाश हे, वही संसार हे