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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 57–64

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 57–64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 57-64

संस्कृत श्लोक

वासनाप्रावृषि क्षीणे संस्थितौ राममागते । जाड्ये जनितहृत्कम्पे पङ्के शोषमुपागते ॥ ५७ ॥ शुष्के तृष्णावटे शान्ते मन्दे हृदयकानने । क्षीणेष्वक्षकदम्बेषु मिथ्याज्ञानघने क्षते ॥ ५८ ॥ क्षीयते मोहमिहिका प्रभात इव शर्वरी । क्वापि गच्छति तज्जाड्यं विषं मन्त्रहतं यथा ॥ ५९ ॥ देहाद्रौ न भयक्षुद्राः सरितः प्रसरन्त्यलम् । नोल्लसन्ति लसत्पक्षाः संकल्पोग्रकलापिनः ॥ ६० ॥ परां निर्मलतामेति संविदाकाशगोचरः । राजतेऽतितरामच्छो जीवादित्यो महोदयः ॥ ६१ ॥ घनमोहभरोन्मुक्ता विविक्तत्वं परं गताः । समये ह्यतिशोभन्ते धौता आशा महादिशः ॥ ६२ ॥ भृशमाभाति विमला मुदिताकाशमञ्जरी । शीतलीकृतदिक्वक्रा शरद्व्योम्नीव चन्द्रिका ॥ ६३ ॥ सर्वसंपत्प्रकाशेन परमानन्ददायिना । भृशं सफलतामेति सुविविक्ता विवेकभूः ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्या के क्षय के प्रकार का ही शरत्काल के रूपक से वर्णन करते हैं। वासनारूपी वर्षा ऋतु का क्षय होने पर मन के स्वरूपस्थिति में विहार को प्राप्त होने पर हृदय को कँपानेवाली अज्ञानिताके हृदयको कैपानेवाले शत्य से युक्त कीचड़ के समान नष्ट होने पर, तृष्णारूपी गड्ढों के सूखने पर, हृदयरूपी जंगल के रागादिरूपी ्ञाडियों के छटने के कारण विरल ओर शान्त होने पर, इन्द्रियसमूहरूपी कदम्बवृक्षो के फलरहित होने पर तथा मिथ्याज्ञानरूपी मेघ के छिन्न-भिन्न होने पर मोहरूपी कुहरा प्रभात होने पर रात्रि के समान नष्ट हो जाता हे । जैसे मन्त्र से हटाया गया विष न मालूम कहाँ चला जाता है वैसे ही वह जडता न मालूम कहाँ चली जाती है । देहरूपी पर्वत पर भयरूपी क्षुद्र नदिर्यो बिलकुल नहीं बहती । चमकीले पंखवाले संकल्परूपी बड़े-बड़े मोर नहीं नाचते । संविद्रूपी आकाश अत्यन्त निर्मलता को प्राप्त होता हे । अत्यन्त स्वच्छ अतएव महान अभ्युदय को प्राप्त हुआ जीवरूपी आदित्य अत्यन्त सुशोभित होता है, मेघरूपी निबिड अज्ञान से छोडी गई अतएव परम शुद्धता को प्राप्त हुई तृष्णारूपी महादिशाएँ समाधिरूपी सूर्योदयकाल मेँ धूलि से अदूषित होकर प्रकाशित होती हैं । निर्मल पुण्यफल का अनुसरण करनेवाली चित्तवृत्ति रूप चित्ताकाश की मंजरी, जिसने दिगूमण्डलों को शीतल कर दिया, शरत्काल के आकाश में चाँदनी के समान खूब शोभित होती है । खूब परिशोधित विवेकरूपी भूमि सब विषयानन्दो को अपने में अन्तर्भूत करके परम आनन्द का प्रकाश करनेवाले आत्मरूपी फल से खूब सफलता को प्राप्त होती हे