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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

चेत्यानुपातकलितचिन्मात्रे तिष्ठताभिधम् । मनाग्विवकल्पकलुषं चित्तत्त्वं जीव उच्यते ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार का मन हो, पर उसके द्वारा बन्धन में डाले जानेवाले जीव का स्वरूप क्या है ? ऐसा यदि कोई पूछे तो उस पर कहते हैं। मन में विषय का वासनारूप से जो प्रवेश है, उससे परिच्छिन्न चिन्मात्र में स्थित अतएव विकल्पों की थोड़ी वासना से कलुषित चित्तत्त्व ही (ब्रह्म ही) जीव कहा जाता है