Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 9–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 9–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 9-15
संस्कृत श्लोक
शुभभावानुसंधानातप्रसन्ने मनसि स्थिते ।
शनैः शनैः प्रशान्ते च मिथ्याज्ञानघनाम्बुदे ॥ ९ ॥
वृद्धिं याते च सौजन्ये यक्षे शुक्ल इवोडुपे ।
विवेके प्रसृते पुण्ये नभसीवार्कतेजसि ॥ १० ॥
धृतावन्तर्विवृद्धायां मुक्तायामिव कीचके ।
स्थितावन्तः कृतार्थायां मधाविव निशाकरे ॥ ११ ॥
फलिते शीतलच्छाये सत्सङ्गसफलद्रुमे ।
स्रवत्यानन्दसुरस समाधिसरलद्रुमे ॥ १२ ॥
मनो भवति निर्द्वन्द्वं निष्कामं निरुपद्रवम् ।
प्रशान्तचापलानर्थशोकमोहभयामयम् ॥ १३ ॥
क्षीणशास्त्रार्थसंदेहं विगताशेषकौतुकम् ।
निरस्तकल्पनाजालं मोहमुक्तमलेपकम् ॥ १४ ॥
निरीहं निरुपाक्रोशं निरपेक्षं निराधिकम् ।
संशान्तशोकनीहारमसक्तं ग्रन्थिवर्जितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अब क्रम से दया, दाक्षिण्य, क्षमा आदि शुभ भावों के अभ्यास से लेकर समाधिपर्यन्त मन की
विश्रान्ति के साधनों को कहते हैं।
शुभ भावों के अनुसन्धान से मन के प्रसन्न होने पर, मिथ्या-ज्ञानरूप घन मेघ के धीरे-धीरे शान्त
होने पर, सौजन्य के शुक्लपक्ष में चन्द्रमा के समान दिन-पर-दिन बढ़ने पर, आकाश में सूर्य के तेज के
समान पुनीत विवेक के फैलने पर, अन्तःकरण मेँ इंद्रिय निग्रह से उत्पन्न धैर्य से बाँस में मोतियों के
समान बढ़ने पर, हदय में आत्मसुख की प्राप्ति से मन के बसन्त ऋतु में चन्द्रमा के समान कृतकृत्य होने
पर, शीतल छायावाले सत्संगरूप फलदार वृक्ष के फलने पर ओर आनन्द से सुन्दर रसवाले समाधिरूपी
सरल वृक्ष के मधु टपकाने पर मन निरद्रन्द, निष्काम और निरूपद्रव हो जाता है । उसके चपलतारूपी
अनर्थ, शोक, मोह और भयरूपी रोग शान्त हो जाते हैँ । शास्त्रार्थ विषयक संदेह कट जाते हैँ । सब
कोतुक (विचित्र वस्तुओं को देखने की उत्कण्ठा) नष्ट हो जाते हैँ । सब कल्पनाएँ हट जाती हैँ । मोह
नष्ट हो जाता हे । उसमें वासना का लेप नहीं रहता । वह आकाक्षारहित, निन्दारहित, प्रवृत्युन्मुख
अवस्था से रहित, दुश्चिन्ताओं से शून्य, शोकरूपी नीहार से रहित, आसक्तिरहित और ग्रन्थियों से
विहीन हो जाता है