Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मनसोऽभ्युदयो नाशो मनोनाशो महोदयः ।
ज्ञमनो नाशमभ्येति मनोऽज्ञस्य विवर्धते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे, अपना नाश तो अभ्युदय है नहीं, प्रत्युत वह अनर्थ ही है, उसमें मन की प्रवृत्ति
कैसे होगी ? तो उस पर कहते है।
मन का अभ्युदय नाश है ओर मनका नाश महान अभ्युदय हे । भाव यह है कि मन की स्वतन्त्रता से
कोई अभ्युदय नहीं चाहता, किन्तु आत्मरूप से सब अभ्युदय चाहते हैँ । आत्मभाव का मनोभाव अनर्थ
रूप ही है, मनोभाव का नाश तो सम्पूर्णं अनर्थो की हानि रूप होने से ओर निरतिशय आनन्दस्वरूप का
परिशेष होने से अभ्युदय ही हे । प्रत्यगात्मा का स्वरूपलाभ से महान अभ्युदय होता हे । यह निर्विवाद हे ।
शंका : तो वेहाहंकारमात्र का त्याग करना चाहिये, ब्रह्मात्मताज्ञान से क्या प्रयोजन है ?
समाधान : जिसे ब्रह्मात्मैक्यज्ञान हो गया है, उसका मन नष्ट हो जाता है ओर अज्ञानी का मन
अज्ञानरूप मल के नष्ट न होने पर वृद्धि को प्राप्त ही है यानी फिर फिर उगता ही है, इसलिए
ब्रह्मात्मेक्यरूप ज्ञान की आवश्यकता हे