Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
जयन्ति ते महाशूराः साधवो यैर्विनिर्जितम् ।
अविद्यामेदुरोल्लासैः स्वमनो विषयोन्मुखम् ॥ १ ॥
संसारस्यास्य दुःखस्य सर्वोपद्रवदायिनः ।
उपाय एक एवास्ति मनसः स्वस्य निग्रहः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त प्रकार से भीम, भास
और दृढ़ की तरह व्यवहार कर रहे आपको सम्पूर्ण व्यवहारो मेँ निरन्तर अनासक्ति से ही तत्त्व बोध
परिपाकरूप एश्वर्य की प्राप्ति होने पर अविरल सुख ओर दुःखों से व्याप्त, जन्म-मरण परम्पराओं में
त्रिविध तापो के भोग के लिए आपकी यह भवपदवी मूलोच्छेदपूर्वक नष्ट हो रही है अन्यथा नहीं ॥ ३ ७॥
चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त
पैतीसवों सर्म
चित्त की शान्ति के उपाय का ओर भोगेच्छा के त्याग का वर्णन,
जो कि सत्संगति, विवेक ओर आत्मबोध से उत्पन्न समाधि से प्राप्त होता है ।
उसमें मन का निग्रह ही मुख्य उपाय है ओर सव उपाय मन के निग्रह के लिये हैं, इस आशय से
पहले मनोनिग्रह की ही प्रशंसा करते हुए सर्य का आरम्भ करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, वे साधुजन महाबली हैं ओर सबके वन्दनीय है, जिन्होंने
अविद्या के विपुल विलासा से विषयों की ओर अभिमुख हुआ अपना मन अपने वश में कर लिया । विविध
उत्पात देनेवाले दुःखरूपी इस संसार की अपने मन का निग्रहरूप एक ही चिकित्सा है