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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

चेत्यप्रपतितं रूढसंज्ञमज्ञत्वमागतम् । तदेवाधिकनिःसारं कल्प्यतेऽन्तर्मनस्तया ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

विषयों में वासनारूप से गिरा हुआ तथा चिरकाल के अभ्यास से विषयों में ही दृढ़ आत्मत्वाभिमान वाले स्वरूप विस्मरण को प्राप्त हुआ जीवस्वरूप ही हजारों विकल्पों से गाढ मोह में पड़ने के कारण सारभूत सुखस्वभाव के हट जाने से जब अधिक निःसार होता है तब जीवोपकरण मनरूप से कल्पित होता है