Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 43
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
सर्वमेव ममात्मेति सर्वभावनयानघ ।
हेयादेयबले क्षीणे बन्धमोक्षो विमुच्यताम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
समाधि के अभ्यास से उत्पन्न धर्मवृद्धि
रूप जल से निर्मलता को प्राप्त हुआ मन इस प्रकार सर्वत्र ब्रह्मदर्शन का ग्रहण करता है, जिस प्रकार
सफेद वस्त्र रंग का ग्रहण करता है ॥४ २॥ हे निष्पाप श्रीरामचन्दजी, सब कुछ मेरी आत्मा है, इस प्रकार
की सर्वात्मभावना से हेयोपादेयरूपी बल के विनष्ट होने पर बन्ध की अपेक्षा रखनेवाले मोक्ष का भी आप
त्याग कीजिये