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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 23–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

नात्मा संसारिपुरुषो न शरीरं न शोणितम् । जडं सर्वं शरीरादि देही स्ववदलेपकः ॥ २३ ॥ शरीरे कणशः कृत्ते नास्त्यन्यद्रुधिरादिकात् । निर्भिन्ने कदलीस्तम्भे नास्त्यन्यत्पल्लवादृते ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जीव और जीव की उपाधि दिखलाकर उनसे रहित शुद्ध आत्मस्वरूप को दशति है । आत्मा न तो वस्तुतः जीव स्वभाव है, न शरीर है और न रुधिर है। शरीर आदि सब जड़ हैं; किन्तु देही आकाश के समान निर्लेप हे