Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
उपशान्ते मनोवायौ देहपांसुः प्रशाम्यति ।
पुनः संसारनगरे न नीहारः प्रवर्तते ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
मन के नष्ट होने पर स्थूल देह भी असत् हो जाती है, ऐसा कहते हैं।
मनरूपी वायु के नष्ट होने पर स्थूलदेहरूपी धूलि भी नष्ट हो जाती हे । फिर संसार के नगर के
तुल्य अधिष्ठानभूत परमात्मा में कुहरे के समान आवरण करनेवाली अविद्या नष्ट होने के कारण कदम
नहीं रखती