Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अलग्नवासनाजाला मतिः प्रसरवर्जिता ।
अदृष्टरागद्वेषा या शममेति शनैः परम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए जिस मति में वासनाओं के
समूह का सम्बन्ध नहीं हे, अतएव जिसमें राग ओर द्वेष दृष्टि नहीं हे, इसीलिए जो जंजाल से रहित हे,
वह धीरे-धीरे परम शम को प्राप्त होती हे