Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 66–67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 66–67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 66,67
संस्कृत श्लोक
विस्तारितं सुसुमतां स्फारितं स्फटिकाकृतिम् ।
उपैति हृत्सरः स्वच्छं नीरजोम्बुजकोशकम् ॥ ६६ ॥
हृत्पद्मकोशान्मलिनः स्वाहंकारमधुव्रतः ।
अपुनर्दर्शनायैव चञ्चलः क्वापि गच्छति ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
परिच्छेद के हट जाने से
विस्तारित, विवेकररूपी जल की वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त किया गया, रजोगुणरहित हृदयरूपी
कमलकोशवाला, स्फटिक की आकृति के तुल्य स्वच्छ हृदयरूपी सरोवर सुन्दर पुष्पों से युक्त हो जाता
है यानी खिल जाता है | हृदयरूपी पद्माकाश से मलिन और चंचल अपना अहंकारूपी भ्रमर फिर दर्शन
न देने के लिए ही न मालूम कहाँ चला जाता है