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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

संदेहोग्रसुतं साग्रं सतृष्णादारपञ्जरम् । नाशयित्वा स्वमात्मानं साधयत्यर्थमैश्वरम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार का मन क्या करता है ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं। आत्मा कौन है, किस तरह का है, किन साधनों से प्राप्त हो सकता है, ज्ञान से अथवा कर्म से, ज्ञान किस प्रकार का है, उसके साधन कौन हैं ? इस प्रकार विविधवादियों से अन्यान्य प्रकार से निरूपण करने के कारण बहुत प्रकार के सन्देहरूपी अविनीत पुत्रवाला, शाखाओं के तुल्य विविध मनोरथो से युक्त तथा तृष्णारूपी स्त्रियों और स्थूल देह से युक्त मन अपने स्वरूप का विनाश करके अपने ईश्वररूप प्रत्यगात्मा से सम्बन्ध रखने वाले जीवन्मुक्तिरूप परमपुरुषार्थ को सिद्ध करता है