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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

सपर्वतवनाभोगं परमालोकसुन्दरम् । अच्छाच्छं शीतलच्छायं जायते भुवनान्तरम् ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

पर्वत ओर वनों की विशालता से युक्त भुवनान्तर के तुल्य शरीर आत्मप्रकाशरूपी सूर्य -चन्द्रमा से अत्यन्त सुन्दर, त्रिविध ताप से शून्य, चिदाभास की छया से युक्त तथा अत्यन्त निर्मल हो जाता है