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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 51

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

दुःखमायात्यसदिति हेयोपादेयरूपि यत् । तदभावेन तु ज्ञानादानन्त्यमवशिष्यते ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

नानात्व का क्यो परित्याग करना चाहिये और एकत्व का क्यो ग्रहण करना चाहिये ? इस प्रश्न पर कहते हैं। हेयोपादेयरूपी जो नानात्व है, वह असत्‌ है, इसीलिए वह जन्म-मरण आदि दुःख की ओर ले जाता है; अतः वह हेय है । नानात्व के न रहने से आत्मतत्त्व का ज्ञान होने के कारण अपरिच्छिन्न आत्मतत्त्व ही अवशिष्ट रहता है, अतः एकत्व उपादेय है, यह अर्थ है