Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 33–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verses 33–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
मनसि स्फारकालुष्ये तद्रूपं जायते फलम् ।
तथैव स्फारनैर्मल्ये तद्रूपं जायते फलम् ॥ ३३ ॥
त्यजत्युदारां न गतिं क्षीणोऽप्यनिशमुत्तमः ।
उद्योगवानविरतं पूरणाशामिवोडुपः ॥ ३४ ॥
नेह बन्धो न मोक्षोऽस्ति नाबन्धोऽस्ति न बन्धता ।
मिथ्योत्थितैव मायेयमिन्द्रजाललता यथा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
मन यदि अत्यन्त कलुषित हो, तो फल भी वैसा ही उत्पन्न
होता है, उसी प्रकार मन यदि अत्यन्त निर्मल हो, तो फल भी निर्मल ही होता है