Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
स्वविकल्पान्नरस्तत्र प्रसार्य रचयत्यलम् ।
जालमात्मनिबन्धाय कोशकारकृमिर्यथा ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे रेशम का कीड़ा अपने बन्धन के लिए जाल की रचना करता है वैसे ही जीव मन में
विकल्प वासनाओं को उत्पन्न करके अपने बन्धन के लिए दृढ़ जाल की रचना करता है