Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
आत्मपीवरताहेतून्विकल्पांश्चायमुज्झति ।
संस्मृत्य प्रभुतामेषु जहाति तृणवत्तनुम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मन इस प्रकार अपने स्वरूप का विनाश करता है ऐसा यदि कोई कहता हो तो इस पर कहते है।
पहले मन विकल्पों में अपने उत्पादन के समान अपने विनाश में भी अपनी सामर्थ्य का विचारकर
अपनी पुष्टि के हेतु शत्रु, मित्र, साधु, असाधु आदि विकल्पों का त्याग करता है । तदनन्तर देहाकार
अपने कल्पितरूप का तृण के समान त्याग करता है । भाव यह है कि जब तक देह में अहंभाव से वासना
युक्त मन देहाकार होता है तभी तक देह के अनुकूल और प्रतिकूल विषयों में राग और द्वेष आदि से
होनेवाले हजारों विकल्पों से वृद्धि को प्राप्त होता है । उसके क्षीण होने पर क्षीण हो जाता है