Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 48
53 verse-groups
- Verse 1राजा सिन्धु को पाकर मध्याहकालीन सूर्य के तुल्य कोप से व्याप्त हुआ
- Verse 2जसे प्रलयकालीन वायु का आघात सुमेरु के तन को टंकार से युक्त करता हे, वेसे ही राजा ने अपने…
- Verse 3जैसे प्रलयकालीन सूर्य अपनी किरणों को छोडता है, वैसे ही रोष के आवेग से प्रवृत्त राजा ने तर…
- Verse 4उसकी प्रत्यंचा से एक ही बाण जाता था, पर वह आकाशमें जाते-जाते हजार हो जाता था ओर लाख होकर…
- Verse 5राजा सिन्धु की भी शक्ति ओर हस्तलाघव राजा विदूरथ के समान ही थे । उनकी ऐसी आश्चर्यमय धनुर्य…
- Verse 6प्रलयकालीन वज़ों की नाई प्रचण्डशब्द करनेवाले मूसलाकार मूसलनाम के उन बाणोँ ने आकाशतल को आच…
- Verse 7आकाश में शब्दायमान सोने के बाणो की कतार प्रलयकालीन पवन से पीडित अतएव शब्द कर रही ओर गिर र…
- Verse 8जैसे समुद्र से जलप्रवाह सदा निकलते रहते हैं और जैसे सूर्य से किरणें निरन्तर निकलती रहती ह…
- Verses 9–10विदूरथ से वे ऐसे निकलते थे, जैसे आँधी से खूब हिलाये गये महावृक्ष से फूल गिरते हैं, जैसे ख…
- Verse 11उन दोनों योद्धाओं के धनुषों के चट-चट शब्द को सुन रही दोनों सेनाएँ शान्त सागरके समान स्तब्…
- Verse 12जैसे सागर की ओर गंगाप्रवाह बहते हैं, वैसे ही युद्ध में राजा सिन्धु की ओर घरघर शब्द से युक…
- Verse 13धनुषरूपी मेघ से चमक रहे सोने के फाल (अग्रभाग) वाले बाणो की वृष्टि “शव“- “शव” शब्द करती हु…
- Verses 14–15उस नगर में रहनेवाली लीला ने राजा सिन्धु को (सागरको) भरने के लिए जा रहे बाणों की गंगा के उ…
- Verse 16हे देवि, आपकी जय हो, ये हमारे स्वामी विजय प्राप्त कर रहे हैं, आप देखिये, इस बाणवृष्टि से,…
- Verses 17–18पति में गाढ प्रेम होनेके कारण आकुलतापूर्वक उसके ऐसा करने पर तथा युद्धदर्शन में व्यग्र दो…
- Verses 19–20राजा सिन्धु ने अपनी बाणवृष्टि से उस बाण समूह रूपी महामेघ को कणशः काट कर फिर उसे महीन धूलि…
- Verse 21राजा सिन्धु ने बाणों की उस वेगवती वृष्टि को तहस-नहस कर रण में अतिशय अनुराग होने से शरीर (…
- Verse 22जैसे प्रलयकालीन मत्त पवन साधारण मेघ को उड़ा देता है वैसे ही राजा विदूरथ ने भी उसे अपने उत…
- Verse 23दोनों राजाओं ने इस प्रकार बाणवृष्टि से, प्रहार ओर प्रतीकार से, एक दूसरे के अस्त्र को व्यर…
- Verses 24–25तदुपरान्त राजा सिन्धु ने गन्धर्वो की मित्रता से प्राप्त विमोहनास्त्र का धनुष में सन्धान क…
- Verses 26–27सम्मोहनास्त्र से उत्पन्न मोह के विदूरथ से भिन्न लोगों को मन्द बनाते न बनाते राजा विदूरथ न…
- Verses 28–31तदनन्तर उसने (सिन्धु ने) भीषण नागास्त्र उठाया, जो कि पाशबन्धन द्वारा दुखदायी था, नागास्त्…
- Verses 32–34तदनन्तर महास्त्रवेत्ता राजा विदूरथ ने सौपर्ण (गारुड) अस्त्र को उठाया । गरुडास्त्र से पर्व…
- Verses 35–38जैसे महामुनि श्री अगस्त्यजी ने भूमि को भरनेवाले (प्लावित कर देनेवाले) कणष्टके साथ इधर उधर…
- Verses 39–40काले सर्परूपी कम्बलो से निर्मुक्त भूमण्डल ऐसा शोभित हुआ, जैसा कि वराह भगवान् द्वारा चिरक…
- Verses 41–43अन्धकार के प्रसार से जगत् स्याही के पंक के सागर के तुल्य हो गया ओर अंजनपर्वत के उपादानरू…
- Verse 44तदुपरान्त मंत्रो मे श्रेष्ठ राजा विदूरथ ने ब्रह्माण्डमण्डल में दीपकतुल्य प्रकाश करनेवाले…
- Verse 45अन्धकाररूपी वस्त्र से उन्मुक्त सुन्दर मेघो से युक्त निर्मल दिशाएँ वस्त्ररहित रमणीय स्तनमण…
- Verse 46उनके मध्य में सज्जनो के अन्तःकरण में लोभरूपी काजल-समूह से मुक्त बुद्धि के समान सम्पूर्ण व…
- Verse 47तदनन्तर क्रोध से व्याकुल राजा सिन्धुने एक क्षण में महाभयंकर राक्षसारत्र का प्रयोग किया
- Verses 48–50राक्षसास्त्र के प्रयोग से दसो दिशाओं से बड़े भयानक और कठोर वनराक्षस निकल आये । वे पातालमे…
- Verses 51–52दाढरूपी मृणालं से आक्रान्त मुखो से ओर कीचड़ से मलिन चक्षु आदि इन्द्रियो से युक्तरोमरूपी स…
- Verse 53जैसे सजल मेघ गरजता है, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि ज्योतियों को निगल जाता है ओर बिजली से युक्…
- Verses 54–55इस श्रेष्ठ अस्त्र के उदित होते ही सूर्य के उदित होने पर जैसे अन्धकार विलीन हो जाता है, वै…
- Verse 56तदनन्तर राजा सिन्धु ने आग्नेयारत्र, जिसने आकाशको प्रज्वलित कर दिया था, छोड़ा, उससे दिशाएँ…
- Verses 57–58धूम्ररूपी मेघो के संघात से आच्छन्न सम्पूर्णं दिशाँ आकाश में गूंथे हुए पाताल के अन्धकारसे…
- Verses 59–60जले हुए पर्वत सोने के से लगते थे ओर फूले हुए और अत्यन्त घने चम्पा वृक्षों के वनों से युक्…
- Verse 61राजा विदूरथ ने आग्नेय अस्त्र को जीतकर रिपु सिन्धु पर भी जैसे यह अरर प्रहार करे वैसे पूजा…
- Verses 62–63उस अरत्र के प्रयोग से शरो के मार्ग के अवकाश में दसों दिशाओं से चारों ओर के अन्धकार के प्र…
- Verses 64–65वे जलप्रवाह क्या थे मानों बाणो के मार्गभूत आकाश में उड़े हुए तमाल वृक्षों के झुण्ड थे, आप…
- Verses 66–67जैसे भुवनव्यापिनी काली रात सन्ध्या को शीघ्र ही पी डालती है, वैसे ही जल संघात ने उन्मत्त उ…
- Verse 68पूर्व अस्त्र द्वारा की गई अपनी मलिनता को हटानेवाले तथा उनसे विरुद्ध अस्त्रवेत्ताओं ने परस…
- Verses 69–70तदनन्तर जल से राजा सिन्धु के अपनी सेना की रक्षा करनेवाले अरत्रशरत्र समूह और श्रेष्ठ योद्ध…
- Verse 71सूर्य के उदय से रात्रि की नाई शोषणारच्र से जलमयी माया शान्त हो गयी जो मर चुके थे वे, मरे…
- Verse 72तदनन्तर मूर्ख के क्रोध के सदुश लोगों को क्लेश पहुँचा रहा सूर्यताप, जोकि सूखे हुए पत्तों स…
- Verses 73–74दिशाओं की चमचमा रहे सुवर्ण के द्रव की नाई सुन्दर शरीर शोभा ऐसी भली मालूम होती थी मानों रा…
- Verses 75–79तदुपरान्त रणभूमि की भयंकरता के बढ़ने पर राजा विदूरथ ने क्रैकार की (प्रत्यंचाशब्द की) शोभा…
- Verse 80दिशाएँ, जिनकी कन्दराएँ मेघों के गर्जन की बढ़ी चढी प्रतिध्वनियो से व्याप्त थी ओर जिनमें मे…
- Verse 81ओले गिरने की कष्टदायक टं टं ध्वनियां से कठिन खूब वेगवाली वृष्टि बड़ी-बड़ी मूसलाधारों से ग…
- Verse 82पहले मेघो के युद्ध के लिए मानों शूरवीरता को धारण किया हुआ सा अग्नि के तुल्य गर्म पृथिवी क…
- Verse 83तदुपरान्त परमात्मा के बोधरूप निरतिशय आनन्दप्रवाह से सांसारिक वासनाओं की नाई मृगतृष्णा को…
- Verses 84–85सारा भूमण्डल कीचड़ से सन गया अतएव उसमें चलना भी दूभर हो गया । राजा सिन्धु जलधाराओं से ऐसा…
- Verse 86दसो दिशाओं में प्रबल आँधी बहने लगी । जैसे वजर गिरने से लोगो के शरीर में दर्द होता है, वैस…