Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 39–40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 39–40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 39,40
संस्कृत श्लोक
ततस्तमोऽस्त्रमसृजत्सिन्धुरन्धान्धकारदम् ।
तेनान्धकारो ववृधे कृष्णो भूजठरोपमः ॥ ३९ ॥
रोदोरन्ध्रे प्रविसृत एकार्णव इवाभवत् ।
मत्स्या इवाभवन्सेनास्ताराश्च मणयोऽभवन् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
काले सर्परूपी कम्बलो से निर्मुक्त भूमण्डल
ऐसा शोभित हुआ, जैसा कि वराह भगवान् द्वारा चिरकाल से उद्भूत अतएव वारि राशि से
निकाला हुआ भूमिमण्डल शोभित हुआ था । तदुपरान्त वह गरुडो की महती वाहिनी, जैसे
वायु के झोंकों से दीपसमुदाय अदृश्य हो जाता है, जैसे शरद् ऋतु से मेघमण्डल लुप्त हो
जाता है, जैसे वज के भय से पक्षयुक्त मेनाक आदि पर्वत संघात सामने से अदृश्य हो जाता
है, जैसे स्वप्नदृष्ट नगर लुप्त हो जाता है ओर मनोरथ से कल्पित नगर तथा जलप्रवाह या
नगरों की परम्परा विलुप्त हो जाती है, वैसे ही, न मालूम कहाँ चली गई ॥ ३ ६-३ ८॥ तदुपरान्त
राजा सिन्धु ने अन्धा बनानेवाले अन्धकार को पैदा करनेवाले तमोस्त्रकी सृष्टि की । उससे
काला ओर शिला के मध्य के समान घना अन्धकार बढा । अन्तरिक्ष और भूमिमण्डल के मध्य
में फैला हुआ वह घना अन्धकार एकमात्र सागर सा हो गया, उसमें दोनों राजाओं की सेनाएँ
मछलियाँ सी हुई और उनके अंग-प्रत्यंग में लगे हुए मणिगण तारे-से हुए