Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 57–58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 57–58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
धूमाम्बुदभराच्छन्ना बभूवुः सकला दिशः ।
गगने प्रोतपातालतिमिराकुलिता इव ॥ ५७ ॥
बभूवुर्ज्वलिताकारा गिरयः काञ्चना इव ।
प्रफुल्लवननीरन्ध्रचम्पकौघवना इव ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
धूम्ररूपी मेघो के संघात से आच्छन्न सम्पूर्णं दिशाँ आकाश में गूंथे हुए पाताल
के अन्धकारसे आकुल सी हो गई