Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 19–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 19–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 19,20
संस्कृत श्लोक
बाणवर्षेण कणशस्तं सायकमहाघनम् ।
छित्त्वा तनुरजः कृत्वा चिक्षेप गगनार्णवे ॥ १९ ॥
यथा दीपस्य शान्तस्य न परिज्ञायते गतिः ।
तस्य सायकसङ्घस्य न विज्ञाता तथा गतिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
राजा सिन्धु ने अपनी बाणवृष्टि से उस बाण समूह रूपी महामेघ को
कणशः काट कर फिर उसे महीन धूलि बनाकर आकाशरूपी सागर में फेंक दिया । जैसे बुझे
हुए दीप की गति नहीं जानी जाती यानी दीपक कहाँ गया, यह ज्ञात नहीं होता, वैसे ही उस
बाणसमुदाय की गति किसीको ज्ञात नहीं हुई