Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 75–79
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 75–79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 75-79
संस्कृत श्लोक
विदूरथो रणोद्रेके तावत्क्रेंकारमाततम् ।
कोदण्डं कुण्डलीकृत्य पर्जन्यास्त्रमथाददे ॥ ७५ ॥
उदगुः पङ्क्तयोऽब्दानां यामिन्य इव संचिताः ।
तमालविपिनोड्डीनसंरम्भादम्बुमन्थराः ॥ ७६ ॥
वामना वारिपूरेण गर्जनोद्दामसंचराः ।
महिम्नामन्थराशेषककुम्मण्डलकुण्डलाः ॥ ७७ ॥
ववुरावलितासारा मेघडम्बरभेदिनः ।
कीर्णसीकरनीहारभारोदाराः समीरणाः ॥ ७८ ॥
प्रपुस्फुरुः सुसौवर्णसर्पापत्सरणोपमाः ।
विद्युतो दिवि दैव्यस्त्रीकटाक्षवलना इव ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
तदुपरान्त रणभूमि की भयंकरता के बढ़ने पर राजा विदूरथ ने क्रैकार की (प्रत्यंचाशब्द
की) शोभा से व्याप्त धनुष को तान कर उसमें पर्जन्य अस्त्र का अनुसन्धान किया । एक स्थान
में ढेर लगा कर रक्खी हुई रात्रियों की नाई जलपूर्णं होने के कारण मन्दगामिनी मेघपंक्तियाँ
तमाल वनों के आकाशमें उड़ने की लीला से उदित हुई । उक्त मेघपंक्तियाँ जलराशि से नमने
के कारण उन्नत नहीं थी, गर्जन ओर तर्जन से उनका गमन बड़ा उद्दाम था, तिरछे विस्तार से
अमन्थर ओर स्वाभाविक विस्तार से कुण्ठित गतिकी नाई संकुचित सम्पूर्णं दिशामण्डल मानों
उनके कुण्डल हो गये थे । विकीर्ण (इधर उधर बिखेरे गये) जलबिन्दुओं ओर शीतलता से
सुखदायक, मेघाडम्बर को भिन्न करनेवाले ओर मूसलाधार वृष्टि से व्याप्त वायु बहने लगे ।
अप्सराओं के कटाक्ष विक्षेप के तुल्य चपल बिजली आकाश में ऐसी चमकती थी, मानों सोने
के साँप किसी बहुत बड़ी आपत्ति से बड़ी उतावली के साथ निकल रहे हों