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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

एक एव विनिर्याति गुणात्तस्य शिलीमुखः । सहस्रं भवति व्योम्नि गच्छन्पतति लक्षशः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसकी प्रत्यंचा से एक ही बाण जाता था, पर वह आकाशमें जाते-जाते हजार हो जाता था ओर लाख होकर गिरता था, भाव यह कि राजा का हस्तलाघव इतना बढा-चढा था कि एक बाण के बाद ही पलकभर में हजार बाण आकाश में दिखाई देते थे ओर गिरने तक उनकी संख्या लाखों तक पहुँच जाती थी