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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 54–55

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 54–55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 54,55

संस्कृत श्लोक

उदीर्यमाण एवास्मिन्मन्त्रराजेऽस्त्रराजयः । राक्षसानां प्रशेमुस्ता अन्धकार इवोदये ॥ ५४ ॥ प्रमुष्टराक्षसानीकमभवद्भुवनत्रयम् । शरदीव गताम्भोदं व्योम निर्मलमाबभौ ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

इस श्रेष्ठ अस्त्र के उदित होते ही सूर्य के उदित होने पर जैसे अन्धकार विलीन हो जाता है, वैसे ही राक्षसों की वे विविध शस्त्रारत्र परम्पराएँ विलीन हो गई । नारायणास्त्र के प्रयोगों से तीनों भुवन राक्षसों की महती सेना से शून्य हो गये अतएव जैसे शरद ऋतु में मेघों से निर्मुक्त अतएव निर्मल आकाश शोभित होता है, वैसे ही राक्षस सेनाशून्य त्रिभुवन शोभित हुआ