Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 17,18
संस्कृत श्लोक
तस्यामेव वदन्त्या तु घनस्नेहरवाकुलम् ।
प्रेक्षणव्यग्रयोर्देव्योर्हसन्त्योर्मानुषीं हृदा ॥ १७ ॥
तच्छरार्णवमामत्तमपिबत्सिन्धुवाडवः ।
शरोष्मणा ह्यगस्त्येन जह्नुर्मन्दाकिनीमिव ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पति में गाढ प्रेम होनेके कारण आकुलतापूर्वक उसके ऐसा करने
पर तथा युद्धदर्शन में व्यग्र दो देवियों के मनुष्य देह में आत्मबुद्धि करनेवाली उस नगर में
निवास करनेवाली लीला के ऊपर हसने पर जैसे जह्नु ऋषि ने गंगाजी को पी डाला था, वैसे
ही सिन्धुरूपी बड़वानल ने अगस्त्य स्थानापन्न हुए बाणरूपी दाह से राजा विदूरथ के बाणसागर
को पी डाला