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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 51–52

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

दंष्ट्राबिसाङ्कुराक्रान्तमुखपङ्काक्षदेहकाः । उदिता लोमजम्बाला दुष्पल्वलतटा इव ॥ ५१ ॥ निगिरन्तः प्रधावन्तो गर्जन्तः सर्जिता इव । जटाजालतडित्पुञ्जा जलदाः सजला इव ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

दाढरूपी मृणालं से आक्रान्त मुखो से ओर कीचड़ से मलिन चक्षु आदि इन्द्रियो से युक्तरोमरूपी सेवाल से युक्त शरीरवाले वे खराब पल्वलं के (छोटे तालाबों ) तटों की नाई उदित हुए थे । खराब पल्लवो के तट मृणालों ओर कीचड़ तथा कमलगट्टों से व्याप्त रहते हैं और सेवाल भी उनमें रहता है