Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 59–60

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 59–60 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 59,60

संस्कृत श्लोक

ययुर्व्योमाद्रिदिक्कुञ्जा ज्वालाजालजटालताम् । कुङ्कुमेनोत्सवे मृत्योः समालब्धा इव स्रजः ॥ ५९ ॥ ज्वलिता जनता चैकशङ्किनी सा नभःस्पृशा । सहस्राकृतिनौवेगचलितेनेव सागरात् ॥ ६० ॥

हिन्दी अर्थ

जले हुए पर्वत सोने के से लगते थे ओर फूले हुए और अत्यन्त घने चम्पा वृक्षों के वनों से युक्त से लगते थे ॥५ ८॥ आकाश, पर्वत ओर दिशामण्डल मृत्यु के उत्सव में कुमकुम से सींची गई मालाओं की नाईं अग्नि की ज्वालाओं के जाल से जटिलता को प्राप्त हो गये यानी व्याप्त हो गये हजारों आकारवाले नौकावेगों से सागर से आये हुए और आकाशचुम्बी बड़वानल से मानों जगत्‌ के अग्निरूपी अद्वैतकी (अग्निरूपताकी) संभावना करती हुई जनता जलाई गई