Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
एतस्मिन्नन्तरे तस्मिँल्लीलानाथो विदूरथः ।
नारायणास्त्रं प्रददे दुष्टभूतनिवारणम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सजल मेघ गरजता है, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि ज्योतियों को निगल जाता
है ओर बिजली से युक्त होता हे, वैसे ही गरज रहे और लोगों को निगल रहे मानों जगत् को
निगलने के लिए ब्रह्मा द्वारा रचे गये से वे जटाजाल रूप बिजली से युक्त थे ॥ ५ २॥ इसी समय
युद्धभूमि में लीलापति राजा विदूरथ ने दुष्ट भूतों का विनाश करनेवाला नारायणास्त्र, प्रयोग
करनेके लिए, उठाया