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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 73–74

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 73–74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 73 ,74

संस्कृत श्लोक

कचत्कनकनिःस्यन्दसुन्दराङ्गच्छविर्दिशाम् । आसीद्राजवरस्त्रीणामिवालेपोऽङ्गसंगतः ॥ ७३ ॥ तेन धर्ममयीं मूर्च्छामाजग्मुस्तद्विरोधिनः । ग्रीष्मदावानलोत्तप्ता मृदवः पल्लवा इव ॥ ७४ ॥

हिन्दी अर्थ

दिशाओं की चमचमा रहे सुवर्ण के द्रव की नाई सुन्दर शरीर शोभा ऐसी भली मालूम होती थी मानों राजाओं की उत्तम सत्रियो के शरीर मेँ लगा हुआ केसर आदि का अंगलेप हो । शोषणास्त्र से राजा सिन्धु के विरोधी ग्रीष्म ऋतु की वनाग्नि के खूब सन्तप्त कोमल-कोमल पल्लवो की नाई ताप से होनेवाली मूर्च्छा को प्राप्त होने लगे