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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 64–65

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 64–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 64,65

संस्कृत श्लोक

तमालौघा इवोड्डीनाः संधिता इव रात्रयः । कज्जलौघा इवोद्भूता लोकालोकतटादिव ॥ ६४ ॥ रसातलगुहाभोगा इव व्योमदिदृक्षवः । महाघुरघुरारावरंहोबृंहितमूर्तयः ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

वे जलप्रवाह क्या थे मानों बाणो के मार्गभूत आकाश में उड़े हुए तमाल वृक्षों के झुण्ड थे, आपस में एक दूसरे से पिरोई हुई रात्रिर्यौँ थो, लोकालोक पर्वत की तलहटी से निकले हुए असंख्य काजल के अन्धकार रूपी ढेर थे आकाश के दर्शनों की तीव्र इच्छावाली विशालकाय पाताल की गुफाएँ थो, जिनकी स्वभावतः विशाल देह महान्‌ घुरघुर शब्द के वेग से ओर भी अधिक बढ़ गई थी