Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
रेजुः कनकनाराचराजयो व्योम्नि सस्वनाः ।
रसन्त्यः कल्पवातार्ताः पतन्त्य इव तारकाः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में शब्दायमान सोने के बाणो की कतार प्रलयकालीन पवन से पीडित अतएव शब्द
कर रही ओर गिर रही तारावली के समान शोभित हुई