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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 48–50

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 48–50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 48-50

संस्कृत श्लोक

उदगुर्भीषणा दिग्भ्यः परुषा वनराक्षसाः । पातालगजफूत्कारक्षुब्धा इव महार्णवाः ॥ ४८ ॥ कपिलोर्ध्वजटाधूम्राः स्फुटच्चटचटारवाः । अग्नयो लेलिहानोग्रजिह्वा आर्द्रेन्धना इव ॥ ४९ ॥ सावर्तवृत्तयो व्योम्नि भीमचीत्कारटांकृताः । अग्निदाहा महाधूमविलोला इव सोल्मुकाः ॥ ५० ॥

हिन्दी अर्थ

राक्षसास्त्र के प्रयोग से दसो दिशाओं से बड़े भयानक और कठोर वनराक्षस निकल आये । वे पातालमें रहनेवाले दिग्गजों की फुफकार से विक्षुब्ध (तरंगित) सागरो के तुल्य थे । उनकी जटाएँ कपिल रंग की ओर ऊपर को खड़ी थी, चट चट शब्द कर रहे थे, उनकी भीषण जीभ लप लपा रही थी, अतएव वे ऊपर उठनेवाली लाल ज्वालाओं से युक्त, चट चट शब्द कर रही थी, जिसमें काली, कराली, मनोजव, सुलोहिता आदि सात उग्र ज्वालाएँ लपलपा रही हों, ऐसी गीले काठवाली अग्नि के समान धूम्रवर्ण के थे। वे आकाश में जलभौंरी की नाई घूमते थे, भीषण चीत्कार शब्द टकार करते थे, अतएव वे अग्नि के सन्ताप से युक्त (जल रहे) ओर महान्‌ धुएँ से चंचल उल्मुकधारियों के सदृश थे