Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 28–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 28-31
संस्कृत श्लोक
नागास्त्रमाददे भीमं पाशबन्धनखेददम् ।
तेनाभवन्नभो व्याप्तं भोगिभिः पर्वतोपमैः ॥ २८ ॥
सर्पैर्विलसिता भूमिर्मृणालैः सरसी यथा ।
संपन्ना गिरयः सर्वे कृष्णपन्नगकम्बलाः ॥ २९ ॥
पदार्थाः सर्व एवेमे विषोष्मखिन्नतां ययुः ।
सपर्वतवनाभोगा ययौ विवशतां मही ॥ ३० ॥
पूताङ्गारसमाकीर्णं विषवैषम्यशंसिनः ।
ववू रूक्षोष्णनीहारवाता ज्वलनरेणवः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर उसने (सिन्धु ने) भीषण नागास्त्र उठाया, जो कि पाशबन्धन
द्वारा दुखदायी था, नागास्त्र से आकाश पर्वताकार साँपों से व्याप्त हो गया । मृणालं से (कमल
की जड़ों से) जैसे तालाब विलास को प्राप्त होता है,वैसे ही सफेद साँपों से भूमि विलसित
हुई,सब के सब पर्वत काले सर्परूपी कम्बलों से आच्छन्न हो गये, ये सभी पदार्थ विष की गर्मी
से खेद को प्राप्त हुए और पर्वतों तथा वनों की विशालता से युक्त भूमि व्याकुलता को प्राप्त हो
गई । विष की विषमता के सूचक, आग की चिनगारियों से पूर्ण और हिमशीतल तथा
स्निग्धपदार्थों को भी रुखे और गर्म कर देनेवाले वायु भस्म से पृथक् किये गये अंगारों से
व्याप्त होकर बहते थे