Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, Verses 84–85
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 48, verses 84–85 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 84,85
संस्कृत श्लोक
आसीत्पङ्काङ्कमखिलं भूमण्डलमसंचरम् ।
पूरितः पूर्णधाराभिः सिन्धुः सिन्धुरिवाम्बुना ॥ ८४ ॥
वायव्यमस्त्रमसृजत्पूरिताकाशकोटरम् ।
कल्पान्तनृत्तसंमत्तरटद्भैरवभीषणम् ॥ ८५ ॥
हिन्दी अर्थ
सारा भूमण्डल कीचड़ से सन गया अतएव उसमें चलना भी दूभर हो गया । राजा सिन्धु
जलधाराओं से ऐसा पूर्ण हो गया जैसा कि जलराशि से समुद्र भर जाता है । यों जलधाराओं से
व्याप्त सिन्धु राजा ने वायव्य अस्त्र का प्रयोग किया । वायव्यास्त्र ने आकाशरूपी कोटर को
(खोखले को) वायु से पूर्णं कर दिया और वह स्वयं प्रलयकाल के नृत्य में मत्त और गा रहे भैरव
के सदुश भीषण था यानी उसमें सांय-सांय शब्द ओर कम्पन प्रचुर मात्रा में हो रहा
था