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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 72

70 verse-groups

  1. Verse 1उतने ही अंश में कैवल्यपद (केवल चिन्मात्र में अवस्थित- स्वरूप कैवल्यपद) जीवन्मुक्त ओर वेदव…
  2. Verse 2हे महाबाहो, जैसे वायु-प्राप्प आकाश पुरुषों का प्राप्य विषय नहीं है, वैसे ही इससे ऊपर का त…
  3. Verse 3जैसे आकाशवीथी (मार्ग) वायुओं को प्राप्त हे, वैसे ही दूर से भी अति दूर यानी अत्यन्त दुरधिग…
  4. Verse 4इससे सदेहमुक्त पुरुषों की पंचम भूमिका से लेकर सप्तम भूमिका तक ही स्थिति रहती है, यह कहते…
  5. Verse 5तुयातीत पद में जब तक विश्रान्ति प्राप्त न हो जाय, तब तक ज्ञान की दृढ़ता करनी चाहिए, न कि…
  6. Verse 6उसमें भी पहले पंचम भूमिका का ही शास्त्रीय व्यवहारो के निर्वाह के लिए अभ्यास करना चाहिए, इ…
  7. Verse 7यदि शंका हो कि देह का विनाश हो जाने पर संवित्‌ का विनाश अवर्जनीय होने के कारण संवित्‌- स्…
  8. Verse 8यदि देहानुभव भ्रम है, तो वही नष्ट हो जाय, इस पर कहते है । हे श्रीरामजी, चाहे देह विनष्ट ह…
  9. Verse 9स्वात्मबोध में सन्देह का निराकरण करते है । भद्र, आप जगत्‌ के अधिष्ठानभूत सत्यतत्त्व को जा…
  10. Verse 10श्रीरामजी, अभीष्ट और अनभीष्ट विषयों को छोड़कर आप शीतल साक्षात्कार रूपी आलोक की शोभा से ऐस…
  11. Verse 11जैसे योग, मन्त्र और तप की सामर्थ्य से आकाशगमन की सिद्धि को प्राप्त हुआ योगी आकाश को छोड़क…
  12. Verse 12हे श्रीरामजी, समस्त ब्रह्माण्ड में देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से शून्य विशुद्ध चैतन्य…
  13. Verse 13जब केवल विशुद्ध चित्‌ ही है, तब उससे भिन्न आत्मा” यह दूसरा नाम कैसे हुआ ? इस पर कहते हैं…
  14. Verse 14जैसे समुद्र जलस्वरूप ही है, उससे भिन्न तरंग आदि कुछ भी नहीं हैं, वैसे ही यह सब जगत्‌ आत्म…
  15. Verse 15जैसे समुद्र में पूर्ण जल के सिवा दूसरा कुछ भी प्राप्त नहीं होता, वैसे ही जगद्रूप से विस्त…
  16. Verse 16हे प्राज्ञ श्रीरामजी, यह देहादि, वह धनादि और मैं आदि की व्यवस्था आप किसमें करते हैं ? देह…
  17. Verse 17परमार्थ में भेद है ही नहीं, इसलिए भेदाधीन देह, देह के साथ सम्बन्ध और देह ग्रहण आदि कलंकों…
  18. Verse 18कर्थचित्‌ भेद मान लिया जाय और देह आदि भी सत्य मान लिये जाय, तो भी उनके साथ आत्मा का सम्बन…
  19. Verse 19जैसे छाया और धूप विस्तार का तथा प्रकाश और अन्धकार का परस्पर सम्बन्ध नहीं होता, वैसे ही शर…
  20. Verse 20हे श्रीरामजी, जैसे सदा-सर्वदा परस्पर विरुद्ध रहनेवाले शीत और उष्ण का एक दूसरे से सम्बन्ध…
  21. Verse 21यदि शंका हो कि देह और आत्मा का संयोग या तादात्म्य सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु समवाय तो हो…
  22. Verse 22श्रीरामजी, दावाग्नि में समुद्र है, यह उक्ति जिस प्रकार दुरवबोधार्थ है, उस प्रकार चिन्मात्…
  23. Verse 23तब अध्यस्त ही सम्बन्ध हो ? इस पर कहते है । जैसे सूर्य की किरणों मे प्रतीत हुआ समुद्र विभ्…
  24. Verse 24शुद्धमपापविद्धम्‌" (आत्मा निर्मल ओर समस्त पापों से विवर्जित है) इत्यादि श्रुतियो से निश्च…
  25. Verse 25यदि शंका हो कि देह का आत्मा के साथ सम्बन्ध नहीं है, तब देह में क्रिया आदि कैसे हो सकते है…
  26. Verse 26पूवोक्त रीति से द्वैत को सत्य मानने पर भी जब आत्मा के साथ देहादि का सम्बन्ध नहीं हो सकता,…
  27. Verse 27द्वैत की अस्तिद्धि ही कैसे है एसी आशंका कर शरीर और आत्मा के सम्बन्ध में दर्शाई गई दूषण यु…
  28. Verse 28वह कौन-सी स्थिति है, जो मुझे प्राप्त करनी है, इस प्रश्न पर उस स्थिति को कहते हैं। हे श्री…
  29. Verse 29विरुद्ध दृष्टि का परित्याग करने पर ही सर्वत्र आत्मद्ृष्टि दढ होती है, इस आशय से कहते है ।…
  30. Verse 30यदि शंका हो कि देह, दुःख आदि का अनुभव प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से होता है ओर आत्मा का भी अनु…
  31. Verses 31–32विरोध होने से भी शरीर और आत्मा के संबन्ध की नाई सादृश्य भी निरस्त किया जा सकता है, ऐसा कह…
  32. Verse 33विरोध होने से ही देह और देही के परस्पर तादात्म्य की शंका भी नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। ज…
  33. Verse 34जैसे छिद्रयुक्त बाँसों से वायु के द्वारा शब्द उत्पन्न होते हैं वैसे ही शरीर के कण्ठरूप छि…
  34. Verse 35इसी युक्ति से चक्षु आदि सम्पूर्ण इन्द्रियों का स्पन्द भी वायु से ही होता है आत्मा का तो क…
  35. Verse 36यद्यपि वह सर्वगत और नित्य है, तथापि चित्त और उसकी वृत्तियों मे ही अभिव्यक्त होती है, अन्य…
  36. Verse 37अतएव चित्त के गमन से ही आत्मा का परलोक में गमन आदि व्यवहार भी होता है, ऐसा कहते है। शरीरर…
  37. Verse 38जहाँ पुष्प रहता है, वहीं पर जैसे गन्ध की संवित्‌ (ज्ञान) रहती है, वैसे ही जहाँ चित्त होता…
  38. Verse 39जैसे सर्वत्र अवस्थित आकाश दर्पण में प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही सर्वत्र अवस्थित आत्मा च…
  39. Verse 40जैसे पृथ्वी में नीचे का स्थान जलका आश्रय स्थान होता हे, वैसे ही अन्तःकरण ही चैतन्य-प्रतिव…
  40. Verse 41जैसे सूर्य की प्रभा आलोक का विस्तार करती है, वैसे ही अन्तःकरण में प्रतिबिम्बित्‌ आत्मसंवि…
  41. Verse 42अतः भूतोंकी उत्पत्ति में (संसृति में) अन्तःकरण यानी समष्टि आत्मा हिरण्यगर्भ ही कारण है, आ…
  42. Verse 43तब अन्तःकरण का कारण कौन है ? इस प्रश्न पर उसका कारण कहते है । प्रखर बुद्धिवाले विद्वान लो…
  43. Verse 44अन्यथाग्रहण के संस्कारों की सामर्थ्यरूप मोह से विभ्रमो की बीज घनीभूत सत्ता का (चित्तपरिणा…
  44. Verse 45तब चित्त विनाश किस कारण से होता है ? इस प्रश्न पर चित्त विनाश में कारण कहते हैं। हे रामजी…
  45. Verse 46इसी चित्त के कारण से संसार का कारणभूत अज्ञान प्राप्त हुआ है, अत: अधिकारी जन को स्वयं उसके…
  46. Verse 47श्रीरामजी ने कहा : मान्यतम हे भगवान्‌, चित्त के ये नाम किस योग से यानी किस व्युत्पत्ति से…
  47. Verse 48उसमें पहले रूढि और योगांश से जीव नाम का निर्वचन करने के लिए महाराज वसिष्ठ जी भूमिका बाँधत…
  48. Verse 49उत्पन्न पदार्थों के स्थावर-विभाग में हेतु बतलाते हैं। जैसे समुद्र का जल चंचल तरंगों में स…
  49. Verse 50जैसे तरंगभाव को प्राप्त हुए जलों में जल अस्पन्दस्वरूप होकर रहता है, वैसे ही उन पदार्थों म…
  50. Verse 51उन भावों में अचंचल (स्थिर) पत्थर आदि पदार्थ तो अपने स्वरूप में अवस्थित हैं और सुरा के फेन…
  51. Verse 52उसमें उन-उन शरीरो में सर्वशक्ति तत्‌-तत्‌ पदार्थ-स्वरूपापन्न आत्मा के द्वारा कल्पित अज्ञा…
  52. Verse 53प्रतिबिम्ब भाव को संप्राप्त अनन्त आत्मा के द्वारा भासित-सा होकर प्रस्फुरित हुआ उक्त अज्ञा…
  53. Verse 54उसमें योगांश को कहते हैं । हे श्रीरामजी, सभास अज्ञान ही प्राण-धारण करने से “जीव' यों कहा…
  54. Verse 55जीव मन आदि की प्रकृति (कारण) होने से प्रकृति, उपचित (बृद्धिगत) होने से देह, अज्ञान अंश की…
  55. Verse 56अज्ञान और ज्ञान के साक्षी दोनों के बीच में रहनेवाला साभास मन ही तत्‌ तत्‌ नाना-रूपता को प…
  56. Verse 57परमात्मा का ही उपाधि में प्रवेश हो जाने से उसके अनेक नाम हो जाते हैं, इसमें श्रुतियों का…
  57. Verse 58(2) 'स एष इह प्रविष्टः आनखाग्रेभ्यः” (यह आत्मा ब्रह्मा से लेकर तृण तक के देहों में नखाग्र…
  58. Verse 59इस युक्ति-प्रयुक्तियों से यह सिद्ध हुआ कि न तो शुद्ध आत्मा संसारी है और न देह ही संसारी ह…
  59. Verse 60अतएव देह का विनाश होने पर भी जीव का विनाश नहीं होता, ऐसा कहते हैं। जैसे आधार (घट) और आधेय…
  60. Verses 61–62जैसे एक पत्ते के रस का विनाश होने पर भी वृक्षव्यापी रस का विनाश नहीं होता, किन्तु अन्य पत…
  61. Verse 63जिस महामूर्ख को इस प्रकार भ्रम हो कि शरीर के नष्ट होने पर मैं नष्ट हो गया, तो उस मूर्ख के…
  62. Verse 64है, तो यह जीव अपनी ब्रह्मस्वरूपता का स्मरण कर निरतिशयानन्दरूपी अभ्युदय को प्राप्त हो जाये…
  63. Verse 65“भे नष्ट हो गया, मैं मर गया” यों लोगों द्वारा विनाशित्व आदि से विशिष्ट जो जीव कहा जाता है…
  64. Verse 66इस संसार में मरण नाम की नदियों में, तरंगों के भीतर तृण के सदृश, प्रतीत होने वाले जीवों के…
  65. Verse 67कल्पना की विलक्षणता में वासना की विलक्षणता हेतु है, इस आशय से कहते है । जैसे बन्दर वन के…
  66. Verse 68हे राघव, जिस शरीर पर वह चला गया, उस शरीर को भी छोडकर दूसरे विस्तृत देश और दूसरे काल में द…
  67. Verse 69जैसे आसक्त उपमाता बालकों को इधर-उधर ले जाती है, वैसे ही अपनी ही वंचक वासना, जिसका कि जीवो…
  68. Verse 70अपने अपने कार्यो की सिद्धियों में एक दूसरे का परस्पर उपयोग करने के कारण जो एक दूसरे के जी…
  69. Verse 71श्रीरामजी, जीर्णो से भी अधिक जीर्ण होकर जिन्होंने दरिद्रता, रोग, वियोग आदि से जनित दुःखों…
  70. Verse 72श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : मुनि वसिष्ठ महाराज के ऐसा कहने पर दिन बीत गया, सूर्य भगवान्‌ अस्त…