Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 58
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 58 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 58
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
(2) 'स एष इह प्रविष्टः आनखाग्रेभ्यः” (यह आत्मा ब्रह्मा से लेकर तृण तक के देहों में
नखाग्रपर्यन्त प्रविष्ट है यानी जल में सूर्य की नाई प्रतिबिम्बित है), इसका उपक्रम कर (प्राणन्नेव
प्राणो भवति वदन्वाक् पश्यँश्चक्षु: शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैतानि कर्मनामधेयानि” (प्राणन
क्रिया को कर रहा आत्मा प्राण नामवाला, वदन क्रिया को कर रहा वाक् नामवाला, दर्शन क्रिया को
कर रहा चक्षु नामवाला, श्रवण क्रिया को कर रहा श्रोत्र नामवाला, मनन क्रिया को कर रहा मन
नामवाला होता है, आत्मा के ये सब नाम कर्मकृत हैं), इसी प्रकार "स समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति
ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्र मति मृत्यो रूपाणि" (स्वप्रकाश आत्मा
संनिहित्वादि से बुद्धि के सदश होकर अन्योन्य धर्म आदि का अध्यास होने पर प्राप्त ओर प्राप्तव्य
दोनों लोकों में संचरण करता है, बुद्धि का ध्यान व्यापार होने पर आत्मा मानों ध्यान करता हुआ-
सा, प्राणादि वायुओं के चलने पर चलता हुआ-सा प्रतीत होता है । स्वप्नाकार में परिणत बुद्धिवृत्ति
के अवभासक रूप से स्वप्नाकार होकर जाग्रत्-व्यवहाररूप इस लोक का अतिक्रमण करता है यानी
उसका अभिमान छोड़ देता है । अज्ञानरूपी मृत्यु के अहमभिमान आदि स्वरूपो का अतिक्रमण करता
है), इसी प्रकार "बुद्धर्गुणिनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टः ।*, “बालाग्रशतभागस्य शतधा
कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ।*, “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।
तदनुप्रविश्य सच्च त्यच्चाभवत् ॥” (संकल्प आदि बुद्धि के गुणों से तथा जरा, मृत्यु आदि शरीर के
गुणों से ज्ञानरूप व्यापक आत्मा आरे के अग्रभाग की नाई दिखाई पडता है,” केश के अग्रभाग के
सौ बार किये गये भाग का पुनः सौ बार किया गया जो विभाग है, उसकी नाई जीव को सूक्ष्मातिसूक्ष्म
जानना चाहिए, वह जीवस्वरूप से अनन्त हो जाता है, जगत् की सृष्टि कर उसीमे आत्मा ने
अतएव वैदिक मार्ग का अनुसन्धान न करनेवाले कुतार्किकों द्वारा की गई विरुद्ध विरुद्ध
जीवस्वरूपकी कल्पनाओं का समादर नहीं करना चाहिए, ऐसा कहते हैं।
अज्ञानी मूढ़ों ने, जो कुत्सित कल्प विकल्पों की सिद्धि के लिए दुष्ट तर्क-वितर्क करने में निपुण हैं,
इस जीवादि संज्ञाओं में केवल मोह के लिए व्यर्थ ही अभिनिवेशों की कल्पना कर रक्खी है