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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 16

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

इतश्चेतश्च जातानि यथा संश्लेषयन्त्यलम् । तरङ्गास्तृणजालानि तथा भूतानि देहदृक् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे प्राज्ञ श्रीरामजी, यह देहादि, वह धनादि और मैं आदि की व्यवस्था आप किसमें करते हैं ? देह आदि भावो में से जो आप हैं और जो आपके साथ सम्बन्ध रखते हैं, उनका स्वरूप क्या है ? और जिनमें आप हैं, और जो आपके नहीं हैं, उसका स्वरूप क्या है ? अधिष्ठान-दृष्टि से किसी के साथ भवद्रूपता और भवत्सम्बन्धिता नहीं हो सकती । हाँ, अध्यास दृष्टि से वैसा हो सकता है, पर वह तो तात्त्विक नहीं है, यह भाव है