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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 33

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 33 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 33

संस्कृत श्लोक

दृश्यदर्शनसंबन्धविस्तारैस्तद्विजृम्भते । दृश्यदर्शनसंबन्धे यत्सुखं पारमात्मिकम् ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

विरोध होने से ही देह और देही के परस्पर तादात्म्य की शंका भी नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। जैसे शीत ओर उष्ण का ऐक्य वाणी के विलास में भी कहीं नहीं दिखाई पड़ता, वैसे ही जड़ और प्रकाशस्वरूप देह और आत्मा का भी संयोग नहीं हो सकता । जब आत्मा ओर अनात्मा का संयोग ही असम्भव है, तब उनका एेक्य तो दूरतः ही निरस्त है, यह भाव है ॥ ३ २॥ यह देह प्राणवायु से ही चलती है, उसी से आती और जाती रहती है एवं देह की नाड़ियों में विलास करनेवाले प्राणवायु से ही शब्द करता है। पहले आत्मा के साथ संयोगादि सम्बन्ध के बिना भी प्राणवायु से देह चेष्टा होती है इसका प्रतिपादन किया था ओर इस समय आत्मा के साथ एेक्य न होने पर देह-चेष्टा प्राण से हो सकती है यह प्रतिपादन किया, इसलिए पुनरुक्ति की शंका नहीं करनी चाहिए