Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यादृशो रश्मिरथयोः स्नेहोद्वेगविवर्जितः ।
संबन्धस्तादृशो देहचित्तेन्द्रियमुखैश्चितेः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे सदेहमुक्त पुरुषों की पंचम भूमिका से लेकर सप्तम भूमिका तक ही स्थिति रहती है, यह
कहते हैं।
निरतिशयानन्दरूपी मद से मत्त महाज्ञानी कुछ समय तक पूर्वोक्त निर्विकारात्मक सुषुप्त अवस्था
से जगत्स्थिति का अनुभव कर उसके बाद तुर्यावस्था को प्राप्त होता हे