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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

जानात्यथात्मनात्मानं मानमेयामयोज्झितम् । मुक्तक्षीबतयेवान्तः स्वां संविदमनुस्मरन् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी, दावाग्नि में समुद्र है, यह उक्ति जिस प्रकार दुरवबोधार्थ है, उस प्रकार चिन्मात्रस्वरूप आत्मा का देह के साथ सम्बन्ध है, यह जो उक्ति है, वह भी असम्भवार्थक हे । यदि देह को चैतन्य का आश्रय माना जाय, तो विषय न हो सकने के कारण उसका स्मरण ही नहीं हो सकेगा । यदि देह को आत्मा का विषय मानेंगे, तो आश्रय न हो सकने के कारण समवाय आदि असिद्ध हो जायेंगे और विषयतासम्बन्ध तो मिथ्यावस्तु में भी रहता है, ऐसी स्थिति से उसमें सत्यत्व रह नहीं सकता, इसलिए तथोक्ति दुरवबोधार्थ हे, यह भाव है