Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
यदहं यच्च भूतादि कालत्रितयभावि यत् ।
दृश्यदर्शनसंबन्धविस्तारैस्तद्विजृम्भते ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
विरुद्ध दृष्टि का परित्याग करने पर ही सर्वत्र आत्मद्ृष्टि दढ होती है, इस आशय से कहते है ।
श्रीरामजी, बड़े-बड़े तत्त्ववेत्ता ओं के द्वारा “मे सुखी हूँ, मेँ दुःखी हूँ, मैं मूर्ख हूँ" इत्यादि प्रत्ययो का
दु्दष्टि शब्द से व्यवहार किया गया है, यदि आप इन प्रत्ययो में वस्तुबुद्धि रखते हँ, तो अवश्य आप
दीर्घकालीन दुःख की ही अभिलाषा रखते हैं, यह मुझे कहना पड़ेगा