Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 48
सैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त अड़तालीसवाँ सर्ग॑ गाधि का कीरनगर में जाकर आश्चर्यपूर्वक देखकर तपस्या से भगवान् विष्णु को प्रसन्न करना तथा विष्णु का यह सब माया है, यह कहना |
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- Verse 1वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, चाण्डालो के घर में चिरकाल से आसक्त गाधि का मन फिर आ…
- Verse 2वहाँ गाधि ने प्रलयकाल के उपद्रव से नष्ट हुए त्रिलोक को जिस तरह ब्रह्मा देखते हैं उसी तरह…
- Verses 3–4आप कहता हैं, वैसे ही जंगल में खण्डहर मेँ उसने अपने मन में कहा कि परिखा मे खाई में गाड़ी ह…
- Verse 5यहाँ पर पहिले मेने मद्य पीकर उन्मत्त हुए अपने चाण्डाल भाईयों के साथ बंदरियो का मांस पके ह…
- Verse 6हाथियों के मद से तीखा मद्य पीकर मैं चाण्डाल तरुणी का सिंहचर्म पर आलिंगन कर यहाँ पर सोया था
- Verse 7यहाँ पर मैंने मांस और खल से पुष्ट हुई कुत्तियाँ मृत हाथियों के दांत रूपी खूँटों पर रस्सिय…
- Verse 8यहाँ पर हाथियों के मोतियों की तीन उखाओं के (थालियों के) परिमाणवाला हाथियों के दाँतों का प…
- Verse 9ये वे भूमिस्थल हैं जहाँ पर आम के पत्तों पर कोकिलों के समान चाण्डाल बालकों के साथ चिरकाल त…
- Verse 10यहाँ पर उन बालकों के साँस से बजते हुए बंसी के ताल स्वर के समान गान किया था, कुत्ती का रुध…
- Verse 11यहाँ पर विवाहों में अपने सब कुटुम्ब के साथ कुटुम्बवाले मैंने जैसे सागरमें कललोल ध्वनिपूर्…
- Verse 12यहाँ पर दूसरे दिन के भोजन के लिये पकड़े हुए काक, भास आदि पक्षियों का जो उड़ने के कारण चंच…
- Verse 13श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, इस तरह की पहिले हुई चाण्डालों की क्रियाओं का (कुकर्मों का) स्…
- Verse 14कर्तव्य को जाननेवाले गाधि उस देश से बहुत काल के बाद चले एवं क्रम से भूतमण्डल नामक देश को…
- Verse 15तदनन्तर बहुत-सी नदियों, पर्वतों, देशों तथा जंगलों का उल्लँघन करके हिमालय पर्वत के मध्य मे…
- Verse 16वहाँ पर गाधि, जिस प्रकार संसार की यात्रा करने से थके हुए नारदजी स्वर्ग को प्राप्त करते है…
- Verses 17–18उसके बाद अपने उपभोग में आये हुए अपने महल, देखे हुए दूसरों के मकान और पूर्व में अपने आनन्द…
- Verses 19–20नागरिक लोगों ने कहा : हे द्विज, यहाँ आठ वर्ष तक चाण्डाल राजा हुआ, जिसको मंगल हस्ती ने राज…
- Verse 21इस प्रकार कुतूहल से भरे हुए गाधि जिस-जिस मनुष्य को देखते थे उस-उस मनुष्य से पूछते थे और उ…
- Verse 22इसके अनन्तर गाधि ने उस नगर में बल-वाहन के साथ (सेना अश्वादि के सहित) राजमहल से बाहर निकले…
- Verse 23उड़ती हुई धूलिरूपी मेघों द्वारा आकाश को आच्छादित करती हुई सेना को देखकर अपनी पूर्वराज्याव…
- Verse 24ये वे ही कीर देश के नृप की कामिनियाँ हैं, जिनकी त्वचाएँ कमल के मध्यभाग की तरह कोमल हैं और…
- Verse 25ये चन्द्रमा की किरणों की राशि के सदृश श्वेत, निश्चल निर्झर के समान, तथा आकाशो के फूलों की…
- Verse 26मनोहर ललनाएँ इन चँवरों को डुला रही हैं, मानों वन की लताएँ खिले हुए पुष्पों की समृद्धि कँप…
- Verse 27कल्पवृक्ष से युक्त मेरु पर्वत की शिखर परम्परा के समान ये वे सब दिशाओं के भागों में उन्मत्…
- Verse 28ये वे इन्द्र के यम आदि लोकपालों के समान राजा के यम, वरुण, कुबेर के समान तेजस्वी अधीन देशो…
- Verse 29ये कल्पवृक्ष लताओं के कुंजों की तरह सुन्दर, सब अभीष्ट वस्तुओं को देनेवाली एवं हर एक वस्तु…
- Verse 30यह वही कीर जनता का राज्य है, जिसका मैंने पहले उपभोग किया था और जिसका आज अपने पूर्वजन्म के…
- Verse 31यह बिलकुल सत्य है कि यह समाचार पहले स्वप्न की तरह देखा गया फिर जाग्रदूभूत होकर सामने खड़ा…
- Verses 32–34कष्ट की बात है, जैसे विस्तार को प्राप्त हो रहे जाल से पक्षी विवश हो जाता है वैसे ही मैं फ…
- Verse 35हा ! बड़े खेद की बात है, अप्रबुद्ध और वासना से नष्ट हुआ मेरा मन नन्हे से बालक के मन की ना…
- Verses 36–39ऐसा सोचकर गाधि उस नगर से चले गये और पर्वत की गुफा में जाकर थके हुए सिंह की तरह बैठ गये
- Verse 40वहाँ उस बड़े भारी तेजस्वी गाधि ने डेढ़ वर्ष तक चुल्लूभर पानी पीकर विष्णु भगवान् को प्रसन…
- Verse 41हे गाधि, मनोवांछित इस मायादर्शन के प्राप्त होने पर पर्वतभूमि में तपस्या करके निष्कलंक हुए…
- Verse 42श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार कह रहे विष्णु भगवान् के दर्शन कर द्व…
- Verse 43पुष्पों को बिखेरते हुए गाधि ने अर्घ्य देकर और प्रदक्षिणा के साथ शीघ्र प्रणाम कर जैसे चातक…
- Verse 44हे भगवान्, यह जो आपने अत्यन्त अन्धकारमय माया दिखाई है, उसको आप जिस प्रकार सूर्य प्रातःका…
- Verse 45हे देव वासनारूपी मल से मलिन मन जिस भ्रम को स्वप्न की नाई देखता है, वह जाग्रदवस्था मेँ भी…
- Verse 46हे अविद्यादिमल से रहित प्रतिष्ठावाले, मुञ्चे जल के अन्दर क्षणभर के लिए स्वप्न की तरह उपलब…
- Verse 47मेरे चाण्डाल विषयक मिथ्या ज्ञान से कल्पित समयकी दीर्घता एवं अल्पता तथा चाण्डाल शरीर का जन…
- Verse 48श्रीभगवान् ने कहा : हे गाधि, जिस संसाररूपी भ्रम को तुम देखते हो यह सब जिसको तत्त्वज्ञान…
- Verse 49यदि कहो है, तो मन में ही है बाहर कुछ नहीं है, ऐसा कहते है । आकाश, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी,…
- Verse 50जिस प्रकार अंकुर से फल, पुष्प आदि बाहर प्रकट होते हैं उसी प्रकार पृथिवी, आकाश आदि पदार्थ…
- Verse 51यह सत्य है कि पूर्वोक्त पृथिवी आदि चित्त में स्थित हैं बाहर कभी नहीं रहते हैं, क्योकि यह…
- Verse 52वर्तमान विषय में चक्षुरादि इन्द्रियों द्वारा रूपालोक प्रत्यय, भावी विषय में मनस्कार प्रत्…
- Verse 53इस पूर्वोक्त बात का सब बालक, वृद्ध और वनिताएँ स्वप्न, भ्रम, मद, आवेग, राग, रोग आदि की बुद…
- Verse 54जैसे जड़ों से (मूलो से) पृथिवी को आक्रान्त किये हुए वृक्ष में लाखों फल और पुष्प रहते हैं,…
- Verse 55जैसे पृथिवी से उखाड़े गये वृक्ष में पत्ते आदि नहीं रहते वैसे ही वासना रहित जीव के जन्म आद…
- Verse 56जिस चित्त में सदधिष्ठान के अवलम्बन से अनन्त जगत्-रूपी जाल फसा है उस चित्त में यदि चाण्डा…
- Verses 57–58जिस प्रकार प्रचुर वेगवाली तथा विविध प्रकार के मानसिक चिन्तारूपी विकार को पैदा करनेवाली चा…
- Verse 59उसी प्रकार “मैं उठ कर जाता हूँ, मैंने भूतमण्डल नाम के ग्राम को प्राप्त किया, ये भूत हैं,…
- Verses 60–61उसी प्रकार कटंजनाम के चाण्डाल का यह नष्ट हुआ प्राक्तन घर है, यों मनुष्यों से कहे गये कटंज…
- Verse 62उसी प्रकार “मेने कीर देश को प्राप्त किया और कीरदेश के वासियों ने मुझसे चाण्डाल के राजा हो…
- Verse 63वासनाओं से ओतप्रोत चित्त अपने भीतर क्या नहीं देखता, वर्ष भर में सिद्ध (पूरा) होनेवाले कार…
- Verse 64न अतिथि है, नवे कीर हैं, न वे भूत हैं और न वह नगर है। हे महाबुद्धिवाले, यह सब तुमने व्याम…
- Verses 65–66तुम भूतदेश और कीर देश को अभी भी नहीं गये, किन्तु अतिथि का वाक्य सुनकर भूतदेश को जाते हुए…
- Verse 67हे द्विज, उसी प्रकार वहीं पर कीरनगर भी भ्रमात्मक देखा है और दूसरे दिन अघमर्षण के समय भी स…
- Verse 68हे मुनि, केवल ये ही पूर्वोक्त भ्रम तुमने नहीं देखे प्रत्युत सब कालों मे समस्त दिशाओं में…
- Verse 69इसलिए उठो ओर शान्त बुद्धि होकर अपना ब्रह्मचर्याश्रमोचित अग्निहोत्रादि एवं स्वाध्याय आदि क…
- Verse 70श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स, तीनों लोकों के तपस्वियों से पूजित एवं भगवान् के चरण स्पर्…